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जनवरी 30, 2012

चौबे दुबे और आपकी कहानी



चौबे जी को अपने एन.जी.ओ. में फंड में कमी आती महसूस हुई. तुरंत कोढ़ कमिटी कि मीटिंग बुलाई गई.

कोढ़ कमिटी कि ज्यादातर मीटिंग सेफ्टीगन पिद्दी में होती थी. वो एक छोटा सा कस्बानुमा गाँव था जो था तो भारत में पर जैसे हिंदू माइनोरिटी होते ही उस जगह शरिया आ धमकता है भले ही वो हिस्सा भारत में हो उसी तरह इस सेफ्टीगन में भी राज एक एन.जी.ओ. चलाने वाले चौबे जी का चलता था.

चौबे जी अपने जमाने में बोडी बिल्डर हुआ करते थे, गाँव वालों को पीटना, फिर भाग के महानगर जा के वहां गुंडागर्दी करते हुए कभी साथियों को तो कभी ड्यूटी कर रहे पुलिस वालों को पीटना वगैरह उनके कर्म थे जिनको कई साल बाद मीडिया पानी से धो के फफूंद हटा के, चमकीली चद्दर में पैक कर के बेच रहा था. और मोटा मुनाफ़ा कमा रहा था.

नहीं पल्ले पड रहा? अब भारत में सच बोलने पे कोई ना कोई आयोग पीछे पडने की संभावना रहती है कभी मानवधिक्कार आयोग, कभी मुस्लिम (अल्पसंख्यक) आयोग कभी चुनाव आयोग तो कभी सरकारी एजेंसियां मिल के ही सात साल पुरानी रसीद निकाल के कहती हैं कि ये तो चोर है !! खैर जान कीबोर्ड पे लेकर थोडा और समझाने की कोशिश करता हूं, क्या है कि भलाई का कीडा काटा है ना मुझे और वो भी बडे जोर से काटा है।

हुआ यूं कि एक बहुत बडे वकील हुआ करते थे। बडे इन द सेंस कि मालदार थे और चोरों की लगभग सभी मंडलियों के सरदारों से राम रमी थी। एक बार वैराग्य जागने पे देव भूमि छोड के अमेरिका जा के वहीं की नागरिकता ले के बस गये थे पर कुछ सालों में ही वहां गुलाटियां मारने को ना मिलने के कारण मन मसोस के आदत के हाथों मजबूर हो के देव भूमि पे धीमे आते कलियुग को तीव्र गति से अवतराने पुन: लौट आये थे ।

वापस आने पर कैटल क्लास पे राज करते समूह में उनको उच्च पद प्राप्ति हुई, जरूर पिछले जन्मों के पुण्यों का फ़ल होगा ऐसा उनके जानकार बताते हैं।

कैटल क्लास पे राज करता समूह वैसे तो निर्विघ्न राज कर रहा था, नये नये तरीके और मार्ग निकाले गये थे जिन पर क्षुद्र मानव नहीं वरन दुनिया के सभी देशों की मुद्रायें निर्बाध गति से इधर से उधर जा सके, पर ना जाने क्यों प्रगति करते कुछ लोग कैटल क्लास का भला सोचने वाले लोगों की आंखों की किरकिरी बन रहे थे । इन कैटल क्लास का भला सोचते लोगों को लग रहा था कि भारत की मुद्रा पे काली स्याही पोत के जो मुद्रा एक्सप्रेस वे पे धकेल दिया जाता है उसे अगर कैटल क्लास के भले पे काम लाया जाये तो शायद इस क्लास का कुछ भला हो !! कैसी कैसी तुच्छ सोच रखते हैं ये लोग भी, क्या करें इन जैसे लोगों ने कभी 'माइक' पकडे लेडी को तो सुना नहीं सो इनकी सोच ही छोटी है, छोटी सोच वालों की छोटी छोटी मांगें !!

पर इन मांग करने वालों में से एक जने से राज करते लोग भयभीत हो गये, वो सीधा साधा सन्यासी था जिसे राजनीती का क ख ग भी नहीं आता था पर उसने इन राज करते , हां यार वही कैटल क्लास पे राज करते लोगों से मुद्रा पे काली स्याही पोतने का विरोध कर डाला और सबसे अजीब मांग तो ये कर डाली कि जो मुद्रा पहले स्याही पोत के एक्सप्रेस वे पे धकेल दी गयी है उसे वापस लाओ ... हा हा हा हा हा मेरी तो हंसी नहीं रुक रही, कैसी कैसी बेतुकी मांगें करते हैं ये कैटल क्लास के लोग !

खैर इस बेतुकी मांग को सुनकर दिल्ली में बैठे चमगादडों ने हाई फ़्रिक्वेंसी में चिल्ली मारी जो कि वो आवाज सुन सकने वाले सभी प्राणियों को पूरी एको साउंड के साथ दुनिया भर में सुनाई दी।

इस चिल्ली को सुन के कई प्राणी सहायता करने आये, राज करते लोगों ने उनमें से जिन लोगों को चुना उनमें से एक गणित का ज्ञाता था जो कि गुणा भाग में माहिर था इतना माहिर कि उसे ये तक याद नहीं रहता था कि उसने किससे कितना रोकडा उधार लिया है और कब कब कहां कहां लिया है ! एक प्राणी ऐसा था जो कि जिंदगी भर ईमानदार छवि के साथ रहा पर अब ठेले पे आ के टैक्सी से आया हूं बोलता था । एक अन्य प्राणी को रंगा सियार कह सकते हैं, वो पवित्र माने जाने वाले भगवा रंग के कडाह में कूद गया था - हरियाणा प्रदेश में कैटल क्लास के राजाओं की खिदमत करते करते, जब बाहर निकला तो सबको सर झुकाये देख के बडा चकराया, आइना देख के उसे जब समझ आया तब से उसने अपने नाम के आगे स्वामी लगा लिया और पूरे जंगल में रंगे सियार की भांति हुक्म देता घूम रहा था कि उसे सीधा भगवान ने ही भेजा है। एक अन्य प्राणी जो चुना गया था वो बचपन में ठुक ठुका के इतना कुंठाग्रस्त हो गया था कि जब वो अपनी आप बीती बताता तो लोग व्यंग समझ के हंसने लगते और वो सबपे लानत भेज के खुश होता रहता। अब सवाल था कि इन सर्कस के प्राणियों का नेता किसे चुना जाये जिसे ये जैसा बोले वैसा करे और जिसका लोग भी भावनाओं में बह के यकीन कर सकें।

इनके नेता के रूप में हमारे प्यारे चौबे जी को चुना गया उनकी ख्याति अनशनकारी के रूप में अपने प्रदेश की सीमायें फ़ाड फ़ाड के बाहर निकलने को बेताब हो रही थीं।

गुणा भाग को भेजा गया चौबे जी को शीशे में उतारने, गुणा भाग ने ये काम बखूबी किया।

चौबे और उनकी मंडली ने आ के "चुरघुस" नाम का मंत्र मीडिया के लाउडस्पीकर में फ़ूंका और वो सारे देश में गूंज गया । इस मंत्र की इतनी महिमा गायी गयी कि सबको यकीन हो चला कि पचास पैसे से ले कर हजार रूपये के नोट तक का भ्रष्टाचार बस अब एक टोपी लगा के 'मैं भी चौबे' बोलने और हमें चाहिये "चुरघुस" बोलने से खत्म हो जायेगा। जनता जो मोमबत्ती जला के ये सब फ़ोर्ड सर्कस कर रही थी को देख देख के यूरो, डोलर और स्विस फ़्रेंक तक सब हंस रहे थे ।

पर चौबे जी ने अपना अनशनकारी धर्म निभाया और मीडिया के कांधे चढ कर देश के लिये उठी आवाजों को 'चेक मेट' कर दिया । और मजे की बात ये कि देश का नाम ले के देश को ही जो शह मात दी गई उसे महसूस तो सबने किया पर गलती किसने, कहां की ये काफ़ी समय तक किसी के समझ ही ना आया। चौबे जी फ़ूले ना समाये ।

हर पांच साल बाद आने वाली बरसात आने को थी । चंदा ठिकाने लग चुका था, फ़ंड में कमी आते देख चौबे जी ने कोढ कमिटी की मीटिंग बुलाई और इस बार सर्कस समुन्दर के किनारे लगाना तय हुआ ।

चौबे जी भूल गये कि जनता ने स्टील के गिलास के अंदर विटामिन मिला पानी और गुणा भाग की कमजोर गणित, ईमानदार का ठेला, रंगे सियार की हुंवा हूंवा, और एक कुंठित व्यक्तित्व को विश्वास के साथ पहचान लिया है ।

समुन्दर के किनारे जो भंडारा लगा उसपे छुट्टी के दिन भी गिने चुने लोग देखे गये । यही वो समय था जब चौबे जी को लगा कि कुछ गलत किया मैंने और उन्होनें घबरा के 'गुणा भाग' की आवाज को पहली बार अनसुना करके जोर से उस सन्यासी को आवाज लगाई जिसके लिये वो कहा करते थे कि इसे तो अपने पांडाल में घुसने तक नहीं दूंगा । पर सन्यासी भी होशियार हो चुका था, उसने छाछ से ना जलने का निश्चय किया और दूर से ही वापस आवाज लगा दी की मेरा आपको पूरा समर्थन है। गोल भवन के कर्णधारों ने उस शाम दो मुर्गे ज्यादा खाये ।

समय होत बलवान । चौबे जी जो मीडिया के कांधे चढ कर महापराक्रमी की पदवी प्राप्त कर चुके थे, समुन्दर किनारे सदमे में आ गये । वैसे ही तबीयत खराब थी थोडी सी, सदमे के कारण और खराब हो गई । जनता उनको अब चौबे जी की बजाय दुबे जी बोलने लग गयी। दु:ख और सदमें में उन्होनें अस्पताल की शरण ली, जहां फ़िर से राज करते लोगों ने उन्हें गिनीपिग बना डाला । और मनुष्यों पे सीधे ही दवाई टेस्ट करने वाले डाक्टर को इस उत्कॄष्ट कार्य के लिये एक सरकारी चाटुकारों को दिया जाने वाला पुरस्कार भी दिया गया । दुबे जी अभी भी स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं, आशा है वो स्वस्थ हो कर लौटेंगे और इस बार गुणा भाग, ईमानदारी का ठेला और कुंठित व्यक्तित्व को किनारे कर राष्ट्र के लिये सच में लडने वाले सन्यासी के साथ ईमानदारी से आ कर पुन: चौबे जी कहलायेंगे । अन्यथा जिंदगी भर चौबे जी रहने के बाद दुबे जी बनने का दर्द उन्हें हमेशा वैसे ही सालता रहेगा जैसे कि 'बहुत बडे वकील' और सरकारी राजपरिवार को नेटवर्किंग साइट्स पर फ़ैला सच सालता है।


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दिसंबर 02, 2011

एक गांव की कहानी - भाग तीन

भाग एक और भाग दो से आगे . . .

इतिहास अपने आप को दोहराता है।

वहीं से शुरु करते हैं जहां कहानी को छोडा था।

प्रधान और ठकुराईन ने इस बीच ये मानते हुए कि गांव में जो तोलता है कम तोलता है और हमेशा ही महंगे भाव बेचता है, दूसरे गांवों से बडे बडे दुकानदारों को गांव में दुकानें खोलने के लिये बुला लिया। जबकि वास्तव में वो अपना लालच और हिस्सा छोड देते तो महंगाई तुरंत कम हो जाती।

लोग पहले से ही परेशान थे, काफ़ी लोगों ने, जिनमें बडी संख्या दुकानदारों की और दुकानदारों द्वारा प्रायोजित भीड की थी, गलियों में खूब चिल्ल पों मचाई। पर प्रधान और मंडली ने रात्रिदमन कांड के समय देख लिया था कि इन चनों में भाड फोडने का दम नहीं है इसलिये वो इन सब घटनाओं के मजे लेते रहे।

कुछ पंचों ने जब विरोध किया तो पहले तो उनको भाव नहीं दिया, फिर उन पर पंचायत में चल रहे मुकदमों का डर और कुछ थैलियां दिखाई जिनके हिलने पर खन खन की आवाज आती थी।

इसके बाद विरोध करने वाले पंचों ने विरोध ठीक उसी तरह किया जैसे नई नवेली दुल्हन सुहागरात को करती है। गांव की गलियों मे हल्ला गुल्ला करने वालों को धर्म और जाति के नाम पर बांट दिया गया और वो क्या करना था ये भूल कर एक दूसरे को खुशी खुशी मारने काटने में जुट गये।

इस बीच पडोस के गावों में कुछ घटनायें घटीं जिनका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था और जिन्होनें दूरगामी परिणाम दिखाये।

पास में एक गांव था जहां ना जाने कैसे पौधे उगाये गये थे कि वहां के लोग मानवभक्षी हो गये थे। उन पर नकेल कसने को और बाडाबंदी करने को जब दूसरे गांवों के लोगों ने कोशिश की तो बढते खर्चों ने उनका रास्ता रोक दिया।  हालांकि वहां के प्राकॄतिक साधन ललचाते थे फिर भी ये घाटे का सौदा लगने लगा। इस बीच प्रधान के गांव और पास के गांव के बीच तालाब में खुदाई करने को लेकर हल्की गर्मागर्मी हुई जिसे मानवभक्षी गांव के लोगों ने बीच में कूद कर युद्ध का रूप दे दिया। दूसरे गांवों के लोगों ने सब पक्षों को खूब हथियार बेच कर मोटा मुनाफ़ा कमाया और अपनी अपनी बर्बाद हुई अर्थव्यवस्था में नई जान डाल ली।

युद्ध का परिणाम क्या रहा?

चूंकि प्रधान के गांव के लोगों ने अपना सारा चिंतन मुद्रा और मुद्रा की दुनिया तक सीमित कर रखा था इसलिये उनके कभी दिमाग में ही‌ नहीं आया कि मानवभक्षी गांव का और तालाब के समीप गांव का गठजोड उनके कितना खिलाफ़ जा रहा है। युद्ध कब उत्कर्ष लाते हैं, ये युद्ध भी अपवाद नहीं था। इसका परिणाम ये निकला कि ये बहुत लंबा चला, धीरे धीरे ये सब गांवों में फ़ैल गया, गुट बन गये और एक दूसरे पर जम कर हमले किये गये। सबसे ज्यादा नुकसान प्रधान के गांव को झेलना पडा। युद्ध में उपयोग में लाये गये हथियारों ने गांव की आधी आबादी को और आधी से ज्याद जमीन का उपजाऊ होना खत्म कर दिया। पचास साल बाद आज टुकडों में बंटा प्रधान का और मानवभक्षी लोगों का गांव दूसरे पडोस के गांवों द्वारा शासित होता है।

बहुत कहानी हो गई, इस कहानी के हिसाब से अभी‌ जो समय गुजर रहा है उसमें मुख्य चुनावों से ठीक पहले हमारे प्यारे प्रधान गुट द्वारा अल्लाह हो अकबर और हर हर महादेव के नारे लगवाये जायेंगे। क्या आप तैयार हैं? ना ना उसके लिये 14 का इंतजार नहीं करना पडेगा आपको, जब हमारे प्यारे रात्रिशक्तिदिखाऊ निरपराधपीटक बेगुनाहहड्डीतोडक लुंगीधारी केंद्रीय मंत्री और परम आदरणीय विमानयात्राजांचमुक्त अद्भुतसंपत्तिउत्पाद्क गांव के सब चरणलोटन मानवों के प्यारे दामाद जी तिहाडधाम प्रस्थान करने वाले होंगे तब, अब आगे आप सोचिये कब.

कथा समाप्तं।


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नवंबर 26, 2011

एक गांव की कहानी - भाग दो


भाग एक से आगे -


गांव वाले अपना सा मुंह ले कर लौट आये | सब समझ रहे थे कि बहुत गलत हुआ है पर कोई भी खुल कर विरोध नहीं कर रहा था | बुजुर्ग बताते हैं कि गांव वाले अक्सर सर झुकाये ही रहते थे | कुछ अपने सर झुकाने का ठीकरा भाग्य पर फोड कर खुद को ग्लानि से मुक्त कर लेते थे, तो कुछ जो हो रहा है उस पर बेबसी जताकर, कि हम क्या कर सकते हैं |


वहीं कुछ इतने समझदार थे कि जब से उन्होंने खुद के लिये पाया कि वो सर झुका के चल रहे हैं, तो उन्होंने कमर भी झुका के चलना शुरू कर दिया और सर झुका के चलने वालों को लानत भेजने लगे | और इस तरह से ना केवल खुद को धोखा दिया वरन प्रधान और ठकुराइन के खास लोगों की कॄपा भी प्राप्त कर ली | बताते हैं कि इनमें ज्यादातर लोग डुगडुगी वाले थे, जो गांव वालों को इतना भरमाते थे कि कभी कभी खुद ही भूल जाते थे कि उन्होंने इसी गांव में जन्म लिया है, और इसी के विनाश के बीज बो रहे हैं


खैर बारिश हुई और जैसा हमेशा होता आया था अच्छी फ़सल होते ही खरीद भाव जमीन पर आ गये |


एक युवा किसान जिसे ये गोरखधंधा कुछ कुछ समझ में आने लगा था, ने जाकर प्रधान के खास और खेती बाडी में टांग अडाने वाले बंदे को रूई की तरह धुनने की असफ़ल कोशिश की | कोई ना कोई युवा ऐसी असफ़ल कोशिश कुछेक सालों में अवश्य ही करता था और तब गांव वाले कुछ देर के लिये अपना झुका हुआ सर सीधा कर लेते थे, भले ही कुछ क्षणों के लिये ही |


भूतकाल में कुछ महाप्रतिभाशाली प्रधानों के समय ही भांप लिया गया था कि आने वाले समय में हमारे चेले चपाटियों में लालच और चोरी करके खाने पर नियंत्रण नहीं रहेगा इसलिये गांव के पहरेदारों की एक अलग टोली बनाई गई थी, जो प्रधान और उनके बंदों और ठकुराइन के कुनबे की चौबीस घंटे रखवाली या सुरक्षा करते थे |


किनसे? अरे गांव वालों से और किनसे? बाहर के गांव वाले इधर आकर इनको कुछ नुकसान पहुंचायें इसके अवसर नगण्य थे, हां पर अपनी रात दिन की कुनबे समेत मेहनत से इन लोगों ने चोरी कर कर के ऐसा माहौल बना लिया था कि बिना पहरेदारों के मिलने पर गांव वाले तुरंत इनका क्रिया कर्म कर डालें |

पर सर झुका के चलने वाले लोग भला इस बात पर क्यों गौर करते कि, इनको सुरक्षा चाहिये का ख्याली पुलाव उनके खून पसीने की मेहनत से पकाये जाते थे

उधर कुछ दिन बाद श्वेतवस्त्रधारी माणूस ने एक बार फिर चौपाल का चक्कर लगाया, गांव वाले बेचारे फिर डुगडुगी वालों और जो माणूस को लेकर आये थे, के झांसे में आ गये और मानने लगे कि अब बस हमारे दु:ख दर्द मानों खत्म होने ही वाले हैं |

लोग चौपाल पर इकट्ठे हो गये अपने अपने जरूरी‌ काम छोडकर | जिनसे जरूरी काम छोडे नहीं गये वो उन कामों को शाम ढले चौपाल के आस पास ही निपटाने लगे | इन सब अंधभक्तों का जयजयकार दूसरे गांवों तक भी सुनाई देता था, पर दूसरे गांव के लोगों के चेहरे पर ना जाने क्यों इस ध्वनि को सुन एक व्यंगात्मक मुस्कान आ जाती थी

एक बार फिर माणूस चौपाल पर गाने गा कर अपने घर लौट गये पर ना जाने किसने किसको कैसी पट्टी पढाई कि गांव वाले खुश हो कर नाचने लगे कि अब हमारे सब दु:ख दर्द दूर हो गये | हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस बात से सहमत नहीं थे, पर एक तो गांव का सर झुका के रहने का रिवाज और दूसरे नक्कारखाने में तूती कौन बने सोच कर चुप ही रहे |

कमर झुका के चलने वालों ने जश्न मनाने की अगुआई की और जश्न मनाते मनाते भी सर झुका के चलने वालों और सर सीधा रख के चलने वालों को लानत भेजने से नहीं चूके |

ठकुराईन दूर गांव में बैठे बैठे ये सब सुन कर मुस्कुराती रहती थी | वो कहां आती थीं कहां जाती‌ थीं या तो वो खुद जानती थीं या ऊपरवाला | प्रधान ने एक दो बार जानने की‌ हालांकि कोशिश की, पर उसकी‌ ये कोशिश ठकुराइन के खास चमचों द्वारा पकड ली‌ गई और प्रधान को झिडकी सुनने को मिली |

सूरज बाबा डूबे, उगे, डूबे, उगे, कुछ दिन बीतते बीतते गांव वालों में ठगे जाने का अहसास घर करने लगा |

उधर गेरुये वस्त्र पहने फ़कीर से हमदर्दी रखने वालों से जब उस रात का रहस्य पूछा गया तो वो इधर उधर देख कर कि कोई सुन तो नहीं रहा है, धीरे से बोले कि प्रधान के नींद लेने के बाद, फ़कीर को उस रात बाकी लोगों के साथ खूबा मारा गया, फ़कीर के पास जो लोग हरदम दिखाई देते थे उनमें से कई के हाथ पैर तोड दिये गये और कोशिश की‌ गई कि ये जिंदा बचे तो एक सबक हमेशा याद रख के जियें और अगर मर जाये तो सबसे अच्छा, बाकी लोग इन लोगों का अनुसरण करने और अपना सर सीधा कर के चलने से पहले सौ बार सोचेंगे |


पर आखिर फ़कीर को मारा क्यों? पैदायशी बुद्धू है क्या? जिसने पूछा उसे सुनने को मिला | कोई चोर कभी मानेगा कि मैं चोर हूं ? वो कभी अपने आप अपना चोरी किया माल लौटायेगा ?


फ़कीर की सोच ही गलत थी, ना जाने कैसी संगत में रहता है फ़कीर, एक क्षुब्ध युवा बडबडाया |


खैर फ़कीर की और जो लोग बेरहमी से मारे पीटे गये थे, उनकी चोटें समय के साथ ठीक हो गईं सिवाय उनके जो इस अमानवीय राक्षसी हमले में मारे गये | हरदम नीती सिद्धांतों की दुहाई देने वाले प्रधान और उनके लोगों ने इस पर ऐसी चुप्पी साधी कि मानों मातॄ-पितॄ शोक के कारण जबान नहीं खुल रही हो | और अगर वो बोलते भी तो क्या? अपने ही आकाओं के खिलाफ़ बोलने वाली आत्मा तो ना जाने वो कब बेच चुके थे |


पर फ़कीर ने नये जोश के साथ सोते हुए और सर झुकाये गांव वालों को जगाने के लिये गांव भर में जा जाकर लोगों को समझाना फिर से शुरू कर दिया, जाने ये फ़कीर क्यों नहीं समझा कि बिना खुद की डुगडुगी बजाये या बिना इन प्राणियों को बोटी खिलाये सब गांव वालों तक बात पहुंचाना लगभग असंभव सा था |


इस बीच गांव में ना जाने कितनी चोरियां हुई, कभी खेल करवाने के नाम पर, कभी खुदाई करने के नाम पर, कभी चुपचाप, कभी रात में और कभी दिन दहाडे, और कुछेक गांव वालों को छोडकर शायद ही किसी के कान पर जूं रेंगी | अगर रेंगी भी‌ होगी तो शायद गौर नहीं किया होगा क्योंकि ठीक इसी समय सब लोग या तो किसी को बदनाम होते देख रहे थे या किसी बदनाम को नाम कमाते |

कहानी काफ़ी सीरियस है, हालांकि इसे व्यंग में पिरोने की मैं जितनी कोशिश कर सकता था मैंने की है, सुझाव, आलोचना या कोई सी भी लोचना हो (केशलोचना को छोडकर) सबका तहे दिल से स्वागत है |
- नरेश

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नवंबर 23, 2011

एक गांव की कहानी - भाग एक

एक गांव की कहानी


एक बार एक गांव था जिसमें सब लोग हिल कर और कभी कभी मिल कर रहा करते थे |


हिल कर ऐसे कि वहां जीना आसान काम ना था, हुआ ये कि वहां के जो प्रधान थे वो दुबारा प्रधान बन गये | कहने को तो लोकतंत्र था पर मर्जी सब पुरानी ठकुराइन की ही चलती थी | प्रधान को सुबह दोपहर और शाम को ठकुराइन के यहां हाजरी देने जाते देखा जा सकता था | गाहे बगाहे नहीं अक्सर उनको फोन पर भी जी मैडम जी मैडम कहते सुना गया था ऐसा उनके कुछ मुंहलगे बताते थे | तो जब ये प्रधान दुबारा सत्तासीन हुए तो ना जाने किसने इनको या इनकी मम्मी (ठकुराइन) को बोल दिया कि ये आपका आखिरी राजपाट है इसके बाद आप दुबारा नहीं आने वाले | हो सकता है कि उसने मजाक किया हो पर प्रधान और उनकी ठकुराइन मम्मी ने इसे सच मान लिया |



फिर क्या था, चीनी बेचने वाले मोटे दुकानदार ने अगले ही दिन चीनी के भाव हर सप्ताह बढाने शुरू कर दिये |

चूल्हा जलाने के लिये जंगल से लकडी काटने पर टैक्स धीरे धीरे बढा कर तिगुना कर दिया गया |

चिट्ठी पत्री लाने ले जाने के काम में तो इतना घपला किया गया कि पंचायत में आज भी सुनवाई हो रही है और पंच खुद चकराये हुए हैं कि इनका करें तो क्या करें |


ना तो गांव की‌ जनता से निगलते बन रहा था और ना उगलते, इसी बीच गांव के बीच में एक गेरुये वस्त्र पहने फ़कीर ने बोला कि मैं अगले महीने चौपाल पर आकर तब तक बैठूंगा और तब तक बैठ रहूंगा जब तक गांव के चोर परेशान होकर खुद को चोर ना बोलें और अपनी अपनी चोरी मान कर चुपचाप चुराया हुआ माल ना लौटा दें | गांव वाले खुश हुए, तालियां बजाइ | गांव वाले अक्सर साल दो साल में बढिया बातें सुनकर खुश हो जाते थे | पर ये बात डुगडुगी वालों ने गांव में किसी को भी नहीं बतायी, बोलते हैं कि उनको ना जाने किसने बहुत मोटी रकम दी‌ थी |


खैर फ़कीर की घोषणा के अगले ही‌ दिन जब उजाला हुआ तो सबने देखा कि चौपाल पर एक श्वेतवस्त्रधारी माणूस बैठा है जो दूर से देखने पर बिलकुल बगुले जैसा दिखाई‌ देता था | गांव वाले पास गये तो माणूस ने कहा गांव वालों अब मैं आ गया हूं अब आप लोग चिंता ना करें हम अब जो भी चोर हैं उनको घर से निकलते ही पकड लेंगे | क्योंकि हम पूरे गांव में फ़ंदा बिछा देंगे | गांव वाले फिर खुश हुए, इतनी जल्दी खुश होने का दूसरा मौका वो छोडना नहीं चाहते थे | डुगडुगी वालों ने मानों श्वेतवस्त्रधारी माणूस को सर आंखों पर बैठा लिया |

पर हिम्मत देखिये ना तो चोरों ने घर से निकलना बंद किया और ना चोरियां | माणूस कुछ दिन चौपाल पर गाने गा कर वापस अपने घर चले गये, पर जो लोग माणूस को गांव में लेकर आये थे, वो गांव वालों का सम्मान पा कर बौरा गये |

अगला महीना आया, फ़कीर ने जैसा बोला था, चौपाल पर डेरा जमाया | चोरों में खलबली मची, क्योंकि गांव वाले भले ही फ़कीर की बातें पूरी नहीं मानते थे पर काम पर खेत जाने से पहले फ़कीर को प्रणाम करके जाते थे | कुछ ही समय में आपस में बात करते चोरों को सुना गया - "यार वो माणूस को तो पूरा सेट कर रखा था, हमारे लोग ही ले के आये थे, पर ये फ़कीर खतरनाक है, अपने आप आया है" - "हां सुना है इसके ना कोई बाल है ना बच्चे" - "क्या ? इसके बाल नहीं है?" - "सम्मिलित खी खी खी" - "चलो यार इसको पहले डरा के देखते हैं ना माना तो रात को ..." फिर से लकडबग्गा के समूह जैसी हंसी सुनाई दी |

वही हुआ जैसा चोरों ने तय किया था | दो दिन बाद जब गांव वाले सोकर उठे तो सवेरे सवेरे उन्होनें पाया कि चौपाल पर कोई नहीं है और चारों तरफ़ खून बिखरा पडा है | कुछ लोगों ने प्रधान से जाकर पूछने की कोशिश की तो उनको बीच में ही‌ रोककर डुगडुगी वालों ने और बेगारों ने बताया कि वो फ़कीर तो खुद चोर था, उससे गांव को खतरा था इसलिये हमने जब उससे मिलने गये तो वो खुद ही भाग खडा हुआ |


पर रात को मिलने ? और वो खून ?

अरे कुछ नहीं तुम लोगों को तो बस बातें बनाने को चाहिये जाओ अपने अपने खेत पर काम करो, ध्यान रखना कि लगान में कोई रियायत नहीं दी‌ जायेगी |

(अगले पोस्ट में जारी ...)


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